Wednesday, September 1, 2010

सत्य वचन कह कर तुमने
क्या नवीन निर्माण किया
जो था धरा पर इसी जगह
उसका ही तो बखान किया

है सृजन झूठ में जितना
सत्य कहाँ उसे पायेगा
नित नवीन सृष्टि के दर्शन
सत्य कहा दिखलायेगा

असत्य बोलना ही तो सृजन हैं
असत्य बिन कहाँ परिवर्तन है

सृष्टि सत्य की रहे यथावत
असत्य क्रमिक विकास की गाथा
एक झूठ सौ झूठ बनाये
सत्य कहाँ इतना चंचल है

बाते अक्सर सत्य बिगाड़े
झूठ मुफ्त बदनाम हुआ
झूठ भरोसे दुनिया चलती
सत्य कहाँ इतना संबल है

झूठ सफलता की कुंजी
आख खोल जग तो देखो
विपदाओ के सर्द सत्य में
झूठ बना हुआ कम्बल है

झूठ तुम्हारा मरते दम तक
संग तुम्हारे लड़ता है
सत्य कहाँ इतना बलशाली
अक्सर धोखा देता है

झूठ बोलना भी एक कला है
सत्य कोई भी बक सकता है
आखो देखा हाल सुनना
कोई चैनल कर सकता है

जो नहीं भुवन में हुआ आज तक
झूठ उसे भी ला सकता है
सत्य ईश की निर्मित रचना
को ही तो बतला सकता है

दोषयुक्त इस सत्य विश्व में
झूठ बोलना ही वैभव है
आओ अपना विश्व रचे
ये झूठ झूठ में संभव है

2 comments:

  1. krit-kritarth karti hui lines hai aapki..
    adbhut vishay par adbhut tark..
    Jai Ho

    ReplyDelete
  2. Maan gaye swami.
    Gajab likhha hai.

    ReplyDelete