(I)
डसा जा चुका है उसे इतनी बार
कि अब न उस पर छाती है बेहोशी
न होता है उसे दर्द
अब बस घुलता जा रहा है ज़हर
उसकी नस नस में.
(II)
पंछी को बंद कर पिंजरे में
नहीं सिखाया जा सकता उड़ना।
पिंजरे का बंद पंछी
नहीं करता है कलरव
पड़ा रहता है होकर कतार बद्ध
चुपचाप, "अनुशासित"।
(III)
(III)
बर्दाश्त नहीं हो पा रहे थे
तुम्हारे ये नकली मुखौटे।
जलने लगा था मेरा चेहरा।
अब मैंने भी एक मुखौटा बना लिया है
तुम्हारे सामने खड़े हो पाने के लिए।
(IV)
(IV)
लगा कर उसके मुंह में लगाम
और बना कर उसे नपुंसक
"शाबाश घोड़ा" कहना,
उदारता नहीं,
उस पर किया एक क्रूर अट्टहास है|
-Prashant Verma
Shandar Prashant :-)
ReplyDeleteati uttam :-)
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