भेड़िये,
बनाकर डॉक्टर का भेष
नोचते है मांस,
सर्जरी के नाम पर.
वो जाते हैं सदियों और समन्दरो के पार,
इतिहास और भूगोल के रेगिस्तान में.
खोजने बीमारियाँ एक स्वस्थ समाज में.
करके छोड़ते हैं उसे अपंग,
और छोड़ देते हैं कीड़े, कुरेद कर उसके घावो को.
फिर उसे बैसाखी देकर,
उसकी टांगो से मांस नोच खाते हैं.
वो खोजते हैं नए नए तरीके,
बस उसे जिन्दा रखने के,
सिखाते हैं उसे कैसे अपने ही अंगो को,
प्रोसेसिंग और कोल्ड चेन से गुज़ारने के बाद,
खाकर स्वस्थ रहा जा सकता है.
राज़ी करते हैं उसे, अपने ही कलाई काटने के लिए.
बताकर कि कैसे उसकी कलाइयाँ सोख लेती है,
सारा का सारा पोषण जो होता है उँगलियों के लिए.
उन्हें आता है कागज़ पर खीचना
कुछ आड़ी तिरछी रेखाएं.
जिनके जरिये वो बताते हैं उसे की,
अपनी दोनों कलाईयाँ काट कर खा लेने के बाद,
उसके खून में कोलेस्ट्राल की मात्रा घट रही है.
और उसके चेहरे पर आई चमक से दुनिया हैरान है.
वे कर बैठे हैं काबू उसके दिमाग पर,
इतनी गहरे से कि समझा देते हैं उसे,
कि उसके कटे हुए घावो से बहता हुआ केसरिया खून,
दरअसल एक जहर है,
जिसे उसे निकल देना चाहिए जल्द से जल्द.
क्यूंकि अब उन्हें जीवित मांस कि आवश्यकता नहीं,
उनकी अगली पीढ़ी में पैदा हो रहे हैं गिद्ध,
जो आसमान में रहते हैं,
बस आते हैं नीचे जमीन पर,
उसके शरीर के टुकड़ो को नोच कर
वापस उड़ जाने के लिए.
-- प्रशान्त वर्मा